Tuesday, April 28, 2009

"परिधि"

किलकारी लेते शिशु की मुस्कान की कहाँ परिधि है,
विद्यालय जाते बालक की आशाओं की कहाँ परिधि है,
प्रथम वेतन से मिलने वाले उल्लास की कहाँ परिधि है,
विवाह रचाते नवयुगल के उत्साह की कहाँ परिधि है

पर यदि हम ये जीवन देखें तो दिखती हर ओर फिर क्यों परिधि है,
सीमित मुस्कान है, सीमित आशाएं है, उत्साह की भी कहीं परिधि है,
कुछ कहते यही सत्य है, पर शायद यहीं असत्य की परिधि है,
सीमित करते हुए स्वयं को, मनु वंशज की यही परिधि है,

क्या निकले थे जो चन्द्र भ्रमण को वो मानव नहीं यक्ष थे,
यदि मानव थे तो क्या किसी विचित्र कला में दक्ष थे,
नहीं, पर हाँ उनकी कल्पना की कहीं कोई परिधि ना थी,
सोचो अन्यथा चन्द्र भ्रमण की कहीं कोई संभावना थी?

हे मनु वंशज तुम भी, सीमित स्वयं को मत करो,
कल्पना करो, और लक्ष्य तक पहुचे बिना मत रुको,
स्वप्न देखो महात्वकान्क्छी, और उन्हें सच कर दिखाओ,
सकल विश्व के लिए एक नया उदाहरण बन दिखाओ.

4 comments:

su said...

Beautiful... I liked the line
"कुछ कहते यही सत्य है, पर शायद यहीं असत्य की परिधि है" the best.

I must say, you've beautifully stringed the basic essence of life, in this poem, in few words. I always used to believe in this philosophy of life, but I think I couldn't have ever put it down so gracefully. I think that's what differentiates a lay man and an artist. :)
Kudos! Keep writing...preferably in hindi :)

mohit said...

Thanks Swati. You really picked the best line in my opinion also.

I think yes, One way of living fulfilling life is to exapand your circle of influence. And become a better person in the process of doing so.

Manish said...

"सुंदर शब्दों में पिरोई हुई, मोहित की सुंदर सोच की कहाँ परिधि है..." Ati sundar!
It reminds me about my childhood when I used to think about... ummm... better i'll put it in small blog. Thanks for giving a topic :)
I really like the way you think and the way you put it on the paper... Great job! :)

Akash said...

oo good, awesome man... just awesome :)